Daily Archives: जून 4, 2012

// सती सावित्री // ( अर्थात वटपौर्णिमा व्रत )

//  सती सावित्री  //

( अर्थातd वटपौर्णिमा व्रत )

 

स्त्री जातीचा मुकुटमणीं    महासती मान मिळोनी

धन्य झाली जीवनीं    पतीव्रता सावित्री   //१//

ब्रह्मा लिखित अटळ   ह्या सूत्रीं केला बदल

हे तिच्या तपाचे फळ   सावित्रीने मिळविले   //२//

जरी येतां काळ   चुकवावी वेळ

बदलेल फळ    हेच दाखविले तीने   //३//

समजण्या धर्म पतिव्रता   ऐकावी सावित्री कथा

मनीं भाव भरुनी येतां   आदर वाटे तिच्या परीं   //४//

मद्रदेशाचा नृपति   नांव तयाचे अश्वपति

कन्या त्याची सावित्री   प्रेम करी तिजवर   //५//

कन्या होती उपवर    धाडीले शोधण्या वर

राजा करी कदर    कन्येच्या इच्छेची    //६//

फिरुनी सर्व देशी    न मिळे कुणीही तीजशी

आली एका आश्रमापाशी    दृष्टीस पडला एक युवक   //७//

नजर त्यावरी पडूनी    स्तंभित राजकन्या होऊनी

रुप लागली न्याहाळूनी   सत्यवान युवकाचे   //८//

तेजोमय युवक पाहूनी    भान जाय हरपूनी

राजकन्येने वरिले मनोमनी   संकल्प लग्नाचा करी   //९//

राजपूत्र होता सत्यवान   पिता जाई राज्य गमावून

अंधत्व पित्याचे त्यास कारण    वनवासी झाले सारे    //१०//

सावित्री परतूनी घरीं     सर्व हकीकत कथन करी

आवड तिची सत्यवानापरी    मनीं त्यास वरिले   //११//

चर्चा करीत समयीं    नारदाचे आगमन होई

आनंदी भाव भरुनी येई    पुता पुत्रीचे   //१२//

वंदन करुनी देवर्षीला     कन्येचा संकल्प सांगितला

आशिर्वाद मागती लग्नाला    सावित्री सत्यवानाच्या   //१३//

नारद वदले खिन्न होऊनी   लग्न संकल्प द्यावा सोडूनी

विचार काढावा मनातूनी   सत्यवानाविषयी    //१४//

दुर्दैवी आहे सत्यवान    त्याची आयुष्यरेषा लहान

एक वर्षांत जाईल मिटून   जीवन त्याचे   //१५//

हे आहे विधी लिखीत    म्हणून होत निश्चीत

कोण करील बदल त्यांत   प्रभूविना   //१६//

ब्रह्मा लिखीत अटळ   झडप घालीतो काळ

न चुके कधी ही वेळ   हीच निसर्ग शक्ती   //१७/

थर्रर्र कापला नृपति    चकीत झाली सावित्री

ऐकून भयंकर भविष्याती     सत्यवानाच्या   //१८//

सावरोनी स्वतःशी   विचार करी मनासी

वदू लागली नारदासी   निश्चयीं स्वरानें   //१९//

प्रथम दर्शनी वरिले    मनोंमनीं पती मानिले

        सर्वस्वी अर्पिण्या संकल्पले   कशी त्यागू मी त्याना   //२०//

काया वाचा मन   सत्यवाना अर्पून

पतिठायी त्याना वरुन   ह्रदयीं बसविले   //२१//

निवड करता पतीची   मनीं बसवुनी प्रतिमा त्याची

कल्पना न यावी दुजाची   हाच स्त्रीधर्म   //२२//

सप्त-पावली हा उपचार   होण्या सर्व जगजाहीर

   धार्मिक विधी एक प्रकार   राहीला असे   //२३//

स्त्रीचा असता हा धर्म   कां सुचविता अधर्म

           सांगा यातूनीच मार्ग    सावित्री विनवी नारदासी   //२४//

पतिव्रता ही श्रेष्ठ शक्ति    करोनी पति भक्ति

          ईश्वर मिळविण्याची युक्ती    सांगू लागले नारद   //२५//

पतिभक्ति करुन      तपसामर्थ्य येइल महान

तेच नेईल उध्वरुन     पावन होता प्रभू   //२६//

बघूनी सावित्रीचा निश्चय    नारद आनंदी होय

आशिर्वाद देऊनी जाय    नारायण नाम घेत   //२७//

दृढ निश्चयाची शक्ति   सावित्रीस चेतना देती

            माहित असून भविष्याती  उडी घेई जीवनयज्ञांत   //२८//

राजकन्या सावित्री    सत्यवानासंगे वनाती

       लग्न करोनी राहती   संसार करण्या   //२९//

पतीसी समजूनी देव   त्याचे ठायीं आदर भाव

मनीं बसवी त्यांचे नांव     अवरित   //३०//

नामात असते लय    लयांत एकाग्रता होय

             एकाग्र मनी ईश्वरी भाव    परमेश्वर सान्नीध्याचा   //३१//

पति हाच परमेश्वर   न पूजे दुजा ईश्वर

              सावित्री त्याचे चरणावर    अर्पण करी सेवा   //३२//

सेवेत असते तप   शक्तीचा तो दीप

                         प्रज्वलीत होईल आपोआप   तपः सामर्थ्य वाढता   //३३//

                      सोडूनी काळजी काळाची  पर्वा नव्हती वेळेची

                             अंतरीक इच्छा समर्पणाची    पतीच्या अल्प अयुष्यी   //३४//

                     वर्षा अखेरचा दिवस भयाण   घेत विश्रांति सत्यवान

                             वटवृक्षाखाली होता झोपून   सावित्री देत मांडीचा आसरा    //३५//

            आयुष्याची रेखा संपता   जीवन दोर जाई तुटतां

                   प्राणज्योत नेई यमदुता    त्याक्षणीं   //३६//

फांस घेऊन यमदूत    नेण्या सत्यवान प्राणज्योत

टाकले फांस गळ्यांत   सत्यवानाच्या   //३७//

सावित्रीची तपशक्ति    देई तिज दिव्य दृष्ठी

सोडून फास गळ्याभोवती    देई दूर फेकून    //३८//

यमदूत जाई घाबरुन     हतबल झाले ते बघून

           सावित्रीची शक्ति जाणून   रिक्त हस्तें गेले यमपूरीं   //३९//

यमराज मृत्युदंडाधिपती    संतापून ते येती

नेण्या प्राणज्योती     सत्यवानाची   //४०//

यमराज प्रभूचे दिक् पाळ   मृत्युरुपी ते महाकाळ

अपूर्व त्यांचे बळ    राज्यकरीं यमपूरी   ///४१//

नेवून मानव प्राणज्योत    कर्माप्रमाणे शिक्षा देत

         पाठवूनी नविन देही    परत जीवन गाडा चालवी   //४२//

रेड्यावर बैसूनी    यमराज आले धाऊनी

हातीं फांस घेऊनी   प्राण नेण्या सत्यवानाचे   //४३//

बसूनी सत्यवाना शेजारीं    पतीधर्माचे ध्यान धरीं

रक्षण कवच उत्पन्न करी   पती पत्नी भोवती   //४४//

तपाची दिव्य शक्ति   यमराजासी येण्या रोकती

फांस त्याचे न पोहोंचती   सत्यवाना पर्यंत   //४५//

बघूनी ते तेजोवलय    यमराज चकीत होय

      शोधूं लागला उपाय   सत्यवानाची नेण्या प्राण ज्योत   //४६//

पतीकडून पाणी मागवून   सावित्रीस दूर सारुन

प्राण ज्योती घेई काढून    सत्यवानाची   //४७//

यमराज निघाला स्वर्गी    सावित्री त्याच्या मागे मार्गी

             पतिव्रता शक्ति तिचे अंगीं    चेतना देई मार्गक्रमण्यास   //४८//

मनीं तिच्या पतिभक्ति    बघून अपूर्व शक्ति

   यमराज प्रसन्न होती    सांगतले वर मागण्या   //४९//

श्वशुराचे अंधत्व गेले   राज्य तया परत मिळाले

वडीलांस पुत्र प्राप्त झाले   सावित्री मिळवी तीन वर   //५०//

न पावली समाधान    पाठलाग चालूं ठेवून

यमासी ठेवीत झुलवून    चर्चुनी विषय निराळे    //५१//

शेवटचा मी वर देईन    परी तू जावे परतून

मानव देहा स्वर्ग कठीण   कसे राहशील तूं तेथें ?  //५२//

जीवन आतां माझें व्यर्थ   न उरे जगण्या अर्थ

एकटेपणा ठरेल अनर्थ   माझ्या आयुष्यीं   //५३//

इच्छा माझी व्हावे माता    सानिध्य मुलाचे मिळतां

एकटेपणाचा भाव न राहता  उर्वरीत जीवनामध्यें    //५४//

पाठलाग घेण्या सोडूनी   तथास्तू म्हटले यमानी

मान्य तिची विनंती करुनी   वर देई तिला   //५५//

तथास्तू म्हणतां क्षणी   धरती गेली हादरुनी

          भयंकर विजा चमकोनी   निसर्ग उत्पात माजला   //५६//

मान्य केले मातृत्व   नसता जीवित पितृत्व

         शक्य कसे हे अस्तित्व   चुक उमगली यमराजा   //५७//

निसर्गाच्या नियमाला   तथास्तूने धक्का दिला

         नियतीचा डाव उलटला   सावित्रीच्या शक्तिनें   //५८//

जसा सुटावा बाण   तसा शब्द जाऊन

         यमराज पेचांत पडून    हारला सावित्रीपूढे   //५९//

सोडून देई प्राणज्योत  सत्यवान जीवदान मिळत

      अखंड सौभ्याग्यवती वरदान    मिळाले सावित्रीला   //६०//

वटवृक्षाखालती   पाऊनी सतीशक्ति

जीवदान मिळती    सत्यवाना   //६१//

ज्येष्ठ शुद्ध पौर्णिमेला   स्त्रीया पूजती वटवृक्षाला

अखंड मिळण्या सौभाग्याला    सावित्रीप्रमाणे   //६२//

पतिपत्नीतील प्रेमभाव    समजोनी मनाचा ठाव

                एकमेका आदरभाव     हीच दिर्घायुष्याची गुरु किल्ली   //६३//

// शुभंभवतु  //

डॉ. भगवान नागापूरकर

९००४०७९८५०